Monday, September 10, 2007

Ek rishta

दोस्तों आज पहली बार मैं इस कम्यूनिटी में अपने पिछली ज़िंदगी के कुछ रिश्तों का सच बयान करने की कोशिश करता हू
मेरा एक गावों है जहाँ मैं पैदा हुआ और बचपन गावों की धूल में खेल कर बड़ा हुआ आज सोचता हूं तो लगता है सिर्फ़ दो दशकों में ज़िंदगी क्या सब कुछ बदल गया लेकिन याद आता है कभी कभी वो बचपन जो अब हमारे आगे की पीढ़िया नहीं जी पाएँगी....उस वक़्त हमारे खेल भी हमारे तरह बहुत सीधे होते थे जैसे गिल्ली डंडा बस दो बच्चे मिले एक लकड़ी पेड़ से तोड़ी बना लिया अपना खेलने का सामान और पूरा दिन निकल जाता था...काँचे जीत लिए अगर तो लगता था जंग जीत गाये
रात में दादी की कहानिया आज भी कानो में गूँजती है कभी कभी और सच पूछिए तो वो एक कहानी जो वो अक्सर दोहराती थी उनके मरने के बाद बहुत याद
आई... अभी भी गावों जाता हूँ हमारे दादा जी बहुत बूढ़े है जब भी जाता हूं तो मेरे पैर छूने पर उनका सर में हाथ फेरना महीनो भूल नहीं पता क्योंकि जब भी उनको
विदा लेता हूं तो दादा जी की असक्त आँखें इस तरह देखती है जैसे वो अब अख़िरी मुलाक़ात है अब बस ये हमारे रिश्ते की बहुत मज़बूत मगर पुरानी छत बस गिरने वाली है
तब ये दिल सोचने को मजबूर होता है की हमने अपने तरक्की के नाम पर क्या क्या खो दिया और क्या दावों पर है... या जिनके पसीने का नमक हमारी सफलता
का आधार है वो शायद आज भी ख़ाली हाथ है पर फिर भी दुआ देते है और हम सिर्फ़ फ़र्ज़ निभाले लेते है....
आज समाज शहरों की तरक्की पर ख़ुश है लेकिन ये भूल जाता है हमारे गावों ने कितनी बड़ी क़ीमत चुकाई है कितने बापों के बेटे और कितने दादाओं के पोते दफ़न है यहाँ
हम क्या संस्कार दे पाएगे अपने बच्चों को अगर ये ना बता सके की गावों से आते वक़्त कौन कौन रोता था हमारे लिए...
अब अपनी जड़ो से कटे हमारे आगे की पीढ़ी को रिश्तों की ये गर्मी कभी महसूस नहीं होगी लेकिन मैं दुआ करता हूं की अगली बार जब मैं गावों जाऊं तो छत मेरे सर महफूज़ रखना मेरे भगवान.........