Wednesday, July 18, 2007

DO RAHI

मैं भावनाओं और यथार्थ के बीत की कशमकश के बीच जो रस्साकशी चलती है उसको समझने की कोशिश कर रहा था......भावनाएँ मन के उस स्थिति को कहतें है जहाँ तर्क का हिस्सा नहीं होता और यथार्थ तर्क की ही कसौटी पर कसा जाता है....तो क्या ये संभव है की भावनाए थोड़ी तार्किक हों और यथार्थ थोड़ा भावुक??????और ये मेरे हिसाब से संभव है क्योंकि भावनाएँ जब जन्म लेती है तो यथार्थ से बिल्कुल अनजान होती है लेकिन समय के साथ धीरे धीरेवो भी यथार्थ के धरातल पर आती है.....और यथार्थ भी जब सच्चाई की कठोरता से सर टकरा टकरा कर थक जाता है तो वो भी कुछ भावनाओं की ओर देखता है और यही एक संतुलित जीवन का आधार है...... लेकिन मुश्किल तब होती है जब मन इन दोनो में फ़र्क नहीं कर पाताहम अपनी भावुक ज़िंदगी को असलियत मान लेते है या फिर सिर्फ़ यथार्थ के कठोरता में भावनाओ की बलि दे देते है.......आज हम दोनो भी इसी दो किनारों पर चलने वाले राही है.... तुम अपनी भावुक ज़िंदगी को असलियत का जामा देने में यथार्थ को क़रीब क़रीब नकार चुकी हो और मैं यथार्थ की दुहाई दे दे कर अपनी भावनाओं की बलि दे चुका हूँ ....... हम दोनो नदी के दो किनारे हैं तुम उस ओर अपनी सपनो की दुनिया में खोई सी और मैं इस किनारे दुनिया की सच्चाइयों से लड़ता हुआ कभी कभी तुम्हारी तरफ़ देखता देखता हूँफिर मेरा तर्क ही मेरा मज़ाक उड़ाता है की मैं उसकी तरफ़ क्यों देख रहा हूँ जो किसी और के सपनो में खोई हुई है ???लेकिन मन फिर ये कहता है की शायद उस पार बैठा वो चेहरा कभी ये समझे की ज़िंदगी ना उसकी पूरी है ना मेरी औरमेरी इसलिए नहीं की तुम नहीं हो और तुम्हारी इसलिए नहीं की मैं नहीं हूँ मैं यानी यथार्थ और तुम यानी सिर्फ़ भावनाएँ, फिर हम दोनो किनारों को छोड़ कर नदी में उतरेंगे.....और ये आस लिए मैं अपनी यात्रा इसी किनारे तब तक जारी रखूँगा जब तक मेरा यथार्थ मेरी भावनाओं को हरा नहीं देता.....या तुम्हारी भावनाए मेरे यथार्थ के धरातल पर अपना वजूद तलाशने नहीं आती..... मैं सोचता हूँ की ज़रूरी तो नहीं कि हम या तुम में से कोई जीते ही क्या दोनो हार नहीं सकते या दोनो जीत नहीं सकते??????ज़िंदगी हमें सब कुछ टुकड़ों में क्यों देती है???? उसके कुछ टुकड़े तुम्हारे पास और कुछ मेरे पास फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि तुम उन टुकड़ो को पूरी ज़िंदगी मानती हो और मैं उनको सिर्फ़ जीने का बहाना...... तुम मानो या ना मानो लेकिन वक़्त आएगा जब तुम अपने सपनों का बोझ उतार कर रखोगी और बिल्कुल ख़ाली हो जाओगी तब तुमको मेरीयाद आएगी और मैं जब अपने यथार्थ से थक जाऊंगा तब तुम मेरे ही दिल के पास होगी........लेकिन तब तक के लिए हम यूँ ही चलते है इस दुनिया में बस कभी कभी एक दूसरे से अपने अपने रास्ते पर चलते हुए मुस्कुराकर एक दूसरे कि तरफ़ देख लिया करेंगे और उसके बाद भी अगर हम कभी ना मिले और तुम्हारी मंज़िल आ जाए तो चुप चाप मत चले जाना बस इस नदी में एक दिया जला कर छोड़ देना वो जब बहते हुए हमारे पास आएगा तो रास्ते थोड़े आसान हो जाएँगे वरना ज़िंदगी में चलना तो नसीब है.......कुछ अकेले चलते है कुछ कारवाँ के साथ!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!